चिकित्सा विज्ञान (Medical Science) और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने एक बेहद चौंकाने वाले और दूरगामी शोध परिणाम की पुष्टि की है। आधुनिक रिसर्च के अनुसार, किसी बच्चे का भविष्य में कैंसर या एडीएचडी (ADHD) जैसी गंभीर बीमारियों से सामना होगा या नहीं, यह काफी हद तक उसकी मां के हाथों में होता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि शिशु का स्वास्थ्य केवल उसके जन्म के बाद मिलने वाले खानपान और लालन-पालन पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि उसकी जैविक नींव मां की गर्भावस्था (Pregnancy) के दौरान ही पड़ जाती है। यही कारण है कि दुनिया भर के वैज्ञानिक गर्भ के वातावरण और जन्म के बाद के शुरुआती 6 महीनों को इंसान के जीवन का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण दौर मान रहे हैं।

शुरुआती जैविक बदलाव बदल देते हैं जीवन की दिशा, दो वैश्विक अध्ययनों ने बढ़ाई चिंता

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए नवीनतम अध्ययनों से यह प्रामाणिक तथ्य सामने आया है कि जीवन के शुरुआती दौर में होने वाले सूक्ष्म जैविक (Biological) बदलाव भविष्य में मानव शरीर और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली पर गहरा और स्थायी असर डालते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, गर्भ में मिलने वाला पोषण, गर्भावस्था के दौरान मां का मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य, जन्म के समय शिशु का वजन और शुरुआती महीनों में मिलने वाला मां का दूध (स्तनपान) मिलकर एक ऐसी बुनियादी संरचना तैयार करते हैं, जिसका प्रभाव जीवनभर देखा जा सकता है।

हाल ही में प्रकाशित दो प्रमुख वैज्ञानिक शोधों की चिकित्सा जगत में व्यापक चर्चा हो रही है। इन शोधों में दावा किया गया है कि यदि गर्भावस्था और शिशु के जन्म के शुरुआती महीनों में कुछ विशेष सावधानियां बरत ली जाएं, तो बच्चों को भविष्य में होने वाले घातक 'बाउल कैंसर' (आंत का कैंसर) और 'अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर' (ADHD) जैसी न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के खतरे से काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक वजन बढ़ना खतरनाक, दशकों बाद आंत के कैंसर का खतरा

लंदन के किंग्स कॉलेज में खानपान, जीवनशैली और स्वास्थ्य जोखिमों पर दीर्घकालिक शोध करने वाली वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. रोजीरड ब्राउनसन-स्मिथ ने अपनी रिपोर्ट में एक बड़ी चेतावनी जारी की है। उनके अनुसार, यदि किसी महिला का वजन गर्भावस्था के दौरान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है या वह मोटापे की शिकार है, तो इसका प्रतिकूल असर उसके बच्चे की सेहत पर कई दशकों बाद (वयस्क होने पर) दिखाई देता है। ऐसे बच्चों में कम उम्र में ही बाउल कैंसर (कोलोरेक्टल या बड़ी आंत का कैंसर) होने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।

बाउल कैंसर सीधे तौर पर बड़ी आंत या मलाशय से शुरू होता है। मल त्याग की आदतों में अचानक बदलाव, ब्लीडिंग होना, बिना कारण वजन घटना या पेट में लगातार ऐंठन व दर्द रहना इसके प्राथमिक लक्षण हैं। डॉ. ब्राउनसन-स्मिथ के मुताबिक, गर्भावस्था में मां का मोटापा बच्चे के गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट (पाचन नली) के विकास को गर्भ में ही प्रभावित कर देता है, जिससे वयस्क होने पर बच्चे की आंतें अस्वस्थ जीवनशैली के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाती हैं और कैंसर की कोशिकाएं पनपने लगती हैं।

सामान्य बच्चों की तुलना में दोगुने से अधिक जोखिम, ग्रोथ हार्मोन का संतुलन बिगड़ना मुख्य वजह

वैज्ञानिकों ने इस खतरे के पीछे दो प्रमुख तकनीकी कारण बताए हैं:

  • मोटापे का आनुवांशिक प्रभाव: मोटापे से पीड़ित मां के बच्चों में आगे चलकर स्वयं मोटापे का शिकार होने की संभावना अत्यधिक होती है। मोटापा अपने आप में कोलोरेक्टल कैंसर का सबसे बड़ा रिस्क फैक्टर है, जो इस खतरे को लगभग पांच गुना तक बढ़ा देता है।

  • हार्मोनल असंतुलन: गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक वजन बढ़ने से गर्भस्थ शिशु के शरीर में बनने वाले जरूरी ग्रोथ हार्मोन्स (Growth Hormones) का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है, जिसका खामियाजा बच्चे को भविष्य में भुगतना पड़ता है।

इसके साथ ही, शोधकर्ताओं का मानना है कि जन्म के समय बच्चे का अत्यधिक वजन होना भी इस बात का सीधा संकेत है कि गर्भ के भीतर का वातावरण सामान्य नहीं था, जो लंबे समय के लिए बच्चे के मेटाबॉलिज्म (उपापचय) को बिगाड़ देता है।

शिशुओं में एडीएचडी (ADHD) का खतरा: 6 महीने का स्तनपान साबित होगा अचूक सुरक्षा कवच

एक अन्य महत्वपूर्ण और समानांतर अध्ययन में न्यूरो-डेवलपमेंटल विकारों को लेकर बेहद राहत देने वाली बात सामने आई है। अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD) एक ऐसी मानसिक स्थिति है, जिसमें बच्चों को किसी एक चीज पर ध्यान केंद्रित करने, शांत बैठने और अपने आवेगों को नियंत्रित करने में भारी कठिनाई होती है। कई मामलों में यह समस्या उम्र बढ़ने के साथ वयस्कता तक बनी रहती है।

'बायोलॉजिकल साइकेट्रिक जर्नल' में प्रकाशित इस शोध के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ बर्गेन, नॉर्वे के विशेषज्ञों ने 37,643 बच्चों और उनकी माताओं के व्यापक स्वास्थ्य आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया। मुख्य शोधकर्ता और मनोचिकित्सक डॉ. बेरिट स्क्रेटिंग सोलबर्ग ने बताया कि जिन शिशुओं को जन्म के बाद शुरुआती कम से कम छह महीनों तक अनिवार्य रूप से केवल और केवल मां का दूध (Exclusive Breastfeeding) पिलाया गया, उनमें आगे चलकर एडीएचडी (ADHD) के लक्षण होने की संभावना न के बराबर पाई गई।

वैज्ञानिकों का कहना है कि मां के दूध में कुछ ऐसे विशिष्ट और प्राकृतिक पोषक तत्व व फैटी एसिड्स मौजूद होते हैं, जो बच्चे के मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र (Nervous System) के स्वस्थ विकास के लिए अनिवार्य हैं, जिसकी पूर्ति कोई भी फॉर्मूला मिल्क या बाहरी दूध नहीं कर सकता। स्वास्थ्य संगठनों ने इस रिपोर्ट के आधार पर दुनिया भर की गर्भवती महिलाओं और माताओं से अपनी जीवनशैली सुधारने और अनिवार्य स्तनपान कराने की पुरजोर अपील की है।