मुंबई: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर इतिहास खुद को दोहराता हुआ नजर आ रहा है, जहां उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) पर एक और बड़े दलबदल का खतरा मंडरा रहा है। राजनीतिक गलियारों में गर्म चर्चाओं के मुताबिक, उद्धव गुट के 9 लोकसभा सांसदों में से 7 सांसद इस समय दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं और वे मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली असली शिवसेना में शामिल होने की तैयारी में हैं। सूत्रों का दावा है कि इस संभावित बगावत की मुख्य वजह पार्टी के भीतर उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे को एक बड़ी संगठनात्मक और नेतृत्वकारी भूमिका सौंपने की तैयारी है। शिंदे गुट के एक वरिष्ठ नेता ने दावा किया है कि कई मौजूदा सांसद आदित्य ठाकरे के नेतृत्व में काम करने को लेकर सहज महसूस नहीं कर रहे हैं।

अटकलें लगाई जा रही हैं कि आगामी 19 जून को, जो अविभाजित शिवसेना का 60वां स्थापना दिवस है, शिवसेना (यूबीटी) आदित्य ठाकरे को लेकर कोई बड़ा ऐलान कर सकती है। इन अफवाहों को तब और बल मिला जब उद्धव ठाकरे द्वारा बुलाई गई सांसदों की एक महत्वपूर्ण बैठक में 9 में से केवल 4 सांसद (अरविंद सावंत, अनिल देसाई, राजाभाऊ राजे और संजय पाटिल) ही व्यक्तिगत रूप से पहुंचे। हालांकि, पार्टी प्रवक्ता संजय राउत ने डैमेज कंट्रोल करते हुए सफाई दी कि बाकी के सांसद फोन के जरिए लगातार नेतृत्व के संपर्क में बने हुए हैं।

बाल ठाकरे के दौर से अब तक के बड़े विभाजन

यह पहली बार नहीं है जब शिवसेना को अपने ही शीर्ष और कद्दावर नेताओं की बगावत का सामना करना पड़ रहा है। संस्थापक बाल ठाकरे के दौर से लेकर आज तक, पार्टी ने कई बड़े और ऐतिहासिक कूटनीतिक विभाजन झेले हैं:

  • 1991 (छगन भुजबल की बगावत): शिवसेना के इतिहास में सबसे पहला बड़ा झटका 1991 में लगा, जब वरिष्ठ नेता छगन भुजबल 17 विधायकों के साथ शिवसेना से नाता तोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। इसने बालासाहेब के मजबूत नियंत्रण पर पहली बार चोट की थी।

  • 2005 (नारायण राणे का जाना): महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे को मतभेदों के चलते साल 2005 में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया, जिसके बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया। इससे कोंकण क्षेत्र में शिवसेना के पारंपरिक आधार को बड़ा नुकसान पहुंचा।

  • 2005-2006 (राज ठाकरे का अलग होना): बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे, जिन्हें कभी उनका असली राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाता था, ने नेतृत्व के संघर्ष के बाद पार्टी छोड़ दी। उन्होंने 2006 में अपनी नई पार्टी 'महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना' (मनसे) का गठन कर शिवसेना के मराठी वोट बैंक के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी।

2022 का महा-संकट और सत्ता परिवर्तन

शिवसेना के इतिहास की सबसे बड़ी और निर्णायक फूट जून 2022 में देखने को मिली, जब तत्कालीन कैबिनेट मंत्री एकनाथ शिंदे ने एक अभूतपूर्व बगावत की अगुवाई की। इसके परिणामस्वरूप उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महा विकास अघाड़ी (MVA) सरकार गिर गई। इस बगावत की मुख्य वजह उद्धव ठाकरे द्वारा साल 2019 में वैचारिक मतभेदों के बावजूद कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के साथ मिलकर सरकार बनाना था, जिसे शिंदे गुट ने बालासाहेब ठाकरे की 'हिंदुत्व विचारधारा' के साथ समझौता करार दिया। इसके अलावा बागी विधायकों ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे तक पहुंच न होने और सरकारी फंड के असंतुलित बंटवारे जैसे गंभीर आरोप भी लगाए थे।

यह राजनीतिक संकट जून 2022 में विधान परिषद चुनावों के दौरान हुई क्रॉस-वोटिंग के बाद बेहद तेज हो गया। एकनाथ शिंदे अपने साथ 11 विधायकों को लेकर पहले गुजरात के सूरत और फिर वहां से असम के गुवाहाटी चले गए। देखते ही देखते शिंदे ने शिवसेना के कुल 55 में से 39 विधायकों का समर्थन हासिल कर लिया, जो कि दलबदल-विरोधी कानून के तहत अयोग्य ठहराए जाने से बचने के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत था। जब सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल द्वारा आदेशित ट्रस्ट वोट पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, तो 29 जून 2022 की रात को उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इस बगावत ने न सिर्फ शिवसेना को दो धड़ों में बांट दिया, बल्कि महाराष्ट्र के पूरे राजनीतिक परिदृश्य को बदल कर रख दिया। अब एक बार फिर, उद्धव ठाकरे के सामने अपने बचे हुए कुनबे को एकजुट रखने की सबसे बड़ी परीक्षा है।