‘धर्म स्वतंत्रता कानून से बढ़ेगा संतुलन’: संत समाज का सरकार को समर्थन
महाराष्ट्र। सरकार द्वारा 'धर्म स्वतंत्र कानून' लागू करने का लिया गया महत्वपूर्ण और दूरदर्शी निर्णय अत्यंत स्वागत योग्य है. इस निर्णय का विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों द्वारा भी उत्साह पूर्वक स्वागत किया जा रहा है. विशेष रूप से संत समाज ने इस पहल को समाज में संतुलन बनाए रखने और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए आवश्यक कदम बताया है।
महाराष्ट्र में 17 मार्च को ‘धर्म स्वतंत्र विधेयक’ का महत्व प्राप्त हुआ
आज हिंदू समाज की ओर से पत्रकार परिषद का आयोजन किया गया. जहां जगद्गुरु सूर्याचार्य कृष्णदेवनंद गिरीजी महाराज (द्वारका, जुना आखाडा), पूज्य स्वामी भारतानंद सरस्वती महाराज और विश्व हिंदू परिषद के माध्यम से राज्य सरकार के प्रति हार्दिक आभार एवं अभिनंदन व्यक्त किया गया. उन्होंने स्पष्ट किया कि देश में धर्मांतरण विरोधी कानूनों की अवधारणा 1956 में प्रस्तुत भवानी शंकर समिति की रिपोर्ट पर आधारित है. गुजरात के बाद महाराष्ट्र में भी 17 मार्च को ‘धर्म स्वतंत्र विधेयक’ प्रस्तुत किए जाने से इस विषय को नई गति और महत्व प्राप्त हुआ है।
धर्मांतरण की घटनाओं के अध्ययन के लिए समिति का गठन
मध्य प्रदेश सरकार ने उस समय धर्मांतरण की घटनाओं का अध्ययन करने के लिए न्यायमूर्ति डॉ. एम. भवानी शंकर नियोगी की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था. इस समिति ने 5 जून 1954 से 5 नवंबर 1955 के दौरान पूरे देश में दौरे कर विभिन्न क्षेत्रों का गहन अध्ययन किया. समिति ने 17 स्थानों का दौरा करते हुए लगभग 7,000 गांवों के 11,360 नागरिकों से सीधे संवाद किया है. 18 अप्रैल 1956 को प्रस्तुत रिपोर्ट में कुछ स्थानों पर प्रलोभन, भय या चिकित्सा सेवाओं के माध्यम से धर्मांतरण होने की घटनाओं का उल्लेख किया गया है. साथ ही आदिवासी समाज के अपने सांस्कृतिक मूलों से दूर जाने की प्रक्रिया संबंधी टिप्पणियां भी दर्ज की गई हैं।
अनुच्छेद 25 में हर नागरिक को धर्म का प्रचार करने का अधिकार
इस समिति की सिफारिशों के बाद देश के कई राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू किए गए हैं. वर्तमान में अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में ऐसे कानून लागू हैं. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसार प्रत्येक नागरिक को धर्म का प्रचार और पालन करने का अधिकार है, लेकिन छल, दबाव या बलपूर्वक धर्मांतरण को रोकने के लिए राज्य सरकारों को कानून बनाने का अधिकार भी प्राप्त है. 'धर्म स्वतंत्र कानून' राज्य के नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करने वाला है और विशेष रूप से महिलाओं की सुरक्षा और उनकी स्वायत्तता की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
'शिक्षा के नाम पर धर्मांतरण कराया जाता है'
जगद्गुरु सूर्याचार्य कृष्णदेवनंद गिरी महाराज ने कहा कि शिक्षा के नाम पर और रोजगार का प्रलोभन देकर धर्मांतरण कराया जाता है. उन्होंने सरकार से निवेदन किया कि विद्यार्थियों को शिक्षा निशुल्क प्रदान की जाए. भारतानंद सरस्वती महाराज ने मांग की कि इस कानून का सख्ती से पालन किया जाए. उन्होंने यह भी कहा कि गौहत्या पर प्रतिबंध होने के बावजूद गोवंश हत्या पूरी तरह बंद नहीं हुई है, इसलिए इस कानून के लागू होने से पुलिस की जिम्मेदारी और बढ़ गई है. इस कानून के माध्यम से धोखाधड़ी, दबाव या बलपूर्वक किए जाने वाले धर्मांतरण की घटनाओं पर प्रभावी रोक लगेगी तथा समाज में पारदर्शिता और कानून के प्रति सम्मान और अधिक मजबूत होगा, ऐसा भी विश्वास व्यक्त किया गया है।

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